Thursday, December 30, 2010

BE A OPTIMIST.............................................believe in LORD {bhagwaan,allah,god................


अभी तक भगवन से मैंने कुछ नहीं माँगा है जानते हो दोस्तों क्यों??? 1.क्योंकि  भगवन तो  हरेक जगह होते हैं , हर बात को वे समझते हैं--- क्योंकि  वही तो हमें और इस दुनिया को बनाये है....|
                                                 तो उनसे मांगने की क्या जरूरत है वे तो खुद हमारे दिल की बात समझ जातें होंगे |

Wednesday, December 29, 2010

सुनो सबकी करो अपने मन की

इसे बात पर मुझे एक गधे और यात्री की कहानी याद आ गयी जो मैंने सुनी थी और कही से पढ़ा भी था ----
एक यात्री अपने छोटे लड़के को गधा पे बैठा के यात्रा कर रहा था | रस्स्ते मे लोग मिले और उनपर कटाक्ष किये --"क्या जमाना है बाप पैदल और बेटा गधे पर |"य...ात्री ने कुछ सोचा और खुद गधे पर बैठ गया अभी कुछ ही दूर आगे गए नहीं की एक आदमी बोला"कैसा कलयुग है भाई नन्हे बेटे को रूखे-कंटिली जमीन पर चला रहा है ये बाप और खुद मटरगस्ती कर रहा है|"फिर यात्री कुछ सोचा और इसबार दोनों गधे पर बैठकर पहाड़ की चढ़ाई करने लगे रस्ते मे लोग मिलते और उनपर व्यंग्य करते "इंसान है की राक्षस है गधे की जान ये लोग ले लेंगे |"फिर यात्री कुछ सोचकर खुद भी पैदल और बेटे को भी पैदल कर ख़ाली गधे के साथ चलने लगा ---रस्ते मे लोग मिलते और खूब जोर से उनपर इसारा कर -कर के हँसते ,बोलते"कैसे बेवक़ूफ़ लोग है खुद पैदल है और गधे को खाली रख छोरा है और यात्रा कर रहे है |
तब यात्री सोचने लगा कुछ भी करो लोग आपका मजाक उड़ायेंगे ही,निंदा करना तो लोगो की आदत ही है,इसीलिए जो उचित लगे वही करना चाहिए|

एक सीख........................जो मैंने अपने जिंदगी से सीखी

जब मै छोटा था , वर्ग-२ मे था तो अंग्रजी के एक  शिक्षक  महोदय  ने मुझे उदास  और गुमशुद(शांत) रहने के लिए डांटा और एक छड़ी  जोड़  की लगाई |
उसके बाद लगभग छः साल  के बाद एक गणित के गुरूजी ने मुझे हँसने के लिए प्रताड़ित किया, डांट लगाई |
मुझे समझ मे ही नहीं आ रहा था मै कैसे रहूँ |
 तब ग्यारहवीं मे मैंने एक समाधान ढूंड निकाला ; दोनों की बिच  की अवस्था यानी मध्यावस्था " मुस्कुराना और शांत रहना " को अपनी जिंदगी मे अख्तियार कर लिया |लेकिन लोगो ने इस आदत को मेरी कमजोरी समझना शुरू  कर दिया ,लोग मुझे सीधा,कमजोर और दब्बू समझने लगे |तब मैंने इस अवस्था का परित्याग कर के एक नयी अवस्था आवारा ,फक्कडपन,हमेशा जागरूक  और मस्त रहने वाले का अपनाया ,अब कोई मेरे सामने नहीं टिक पा रहा था ,जो मुझमे पहले से ही था |
तब मुझे लोग आदर्शवाद का पाठ पढ़ाना शुरू कर दिए | जब आदर्शवादी था तो  कुछ महत्व नहीं दिया जा रहा था ;अब नहीं था  तो इसका महत्व बताया  जा रहा था  |मुझे ये अजीब विडम्बना मालूम(प्रतित) हो रही थी |
अंततोगत्वा मै इस निर्णय पर पहुंचा की तुम कुछ भी करो,कैसे भी रहो ,तुम्हे लोग कुछ न कुछ कहते रहेंगे |निंदक तुम्हारी निंदा करते ही रहेंगे ,तुम्हे  निंदा से न घबराकर आगे बढ़ना होगा ,धैर्य नहीं खोना होगा ; आगे बढ़ते ही जाना होगा   रास्ते खुद ब खुद बनते जायेंगे |
                                                                                      --श्रीराम तिवारी(बीरा)