जब मै छोटा था , वर्ग-२ मे था तो अंग्रजी के एक शिक्षक महोदय ने मुझे उदास और गुमशुद(शांत) रहने के लिए डांटा और एक छड़ी जोड़ की लगाई |
उसके बाद लगभग छः साल के बाद एक गणित के गुरूजी ने मुझे हँसने के लिए प्रताड़ित किया, डांट लगाई |
मुझे समझ मे ही नहीं आ रहा था मै कैसे रहूँ |
तब ग्यारहवीं मे मैंने एक समाधान ढूंड निकाला ; दोनों की बिच की अवस्था यानी मध्यावस्था " मुस्कुराना और शांत रहना " को अपनी जिंदगी मे अख्तियार कर लिया |लेकिन लोगो ने इस आदत को मेरी कमजोरी समझना शुरू कर दिया ,लोग मुझे सीधा,कमजोर और दब्बू समझने लगे |तब मैंने इस अवस्था का परित्याग कर के एक नयी अवस्था आवारा ,फक्कडपन,हमेशा जागरूक और मस्त रहने वाले का अपनाया ,अब कोई मेरे सामने नहीं टिक पा रहा था ,जो मुझमे पहले से ही था |
तब मुझे लोग आदर्शवाद का पाठ पढ़ाना शुरू कर दिए | जब आदर्शवादी था तो कुछ महत्व नहीं दिया जा रहा था ;अब नहीं था तो इसका महत्व बताया जा रहा था |मुझे ये अजीब विडम्बना मालूम(प्रतित) हो रही थी |
अंततोगत्वा मै इस निर्णय पर पहुंचा की तुम कुछ भी करो,कैसे भी रहो ,तुम्हे लोग कुछ न कुछ कहते रहेंगे |निंदक तुम्हारी निंदा करते ही रहेंगे ,तुम्हे निंदा से न घबराकर आगे बढ़ना होगा ,धैर्य नहीं खोना होगा ; आगे बढ़ते ही जाना होगा रास्ते खुद ब खुद बनते जायेंगे |
--श्रीराम तिवारी(बीरा)
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