Friday, March 18, 2011

एक वार्तालाप फुर्सत के क्षणों में

  • Pragya Maitri ‎4 tiwaari ji!आकुल आतुर दुःख से कातर पटक पटक रो रोकर |
    करता है कितना कोलाहल तिवारी जी का मन निर्मल ||
    about an hour ago · · 1 personLoading...
  • Shriram Tiwary निर्मल तो है मेरा मन जी,
    क्यूँ रो रो कर करती है अपना मन निर्मम,
    ज्वाला को छूने से जल जाता है बर्फ का तन |@ Pragya Maitri
    about an hour ago ·
  • Pragya Maitri नव उज्ज्वल जलधार हार हीरक सी में सोहती |
    बिच बिच लहराती बूँद मनु मुक्तामणि पोहती ||
    57 minutes ago · · 1 personYou like this.
  • Shriram Tiwary एक निर्मल,पवित्र मन मुग्ध था मिर्ग्मारिच्का पर.
    जब पास आया तो देखकर क्षुब्ध हुआ ,रोया ,पछताया समय गंवाया |
    पर सोचा ,कम से कम थोडा आनंद तो मिला अल्प समय मे |हा हा अ हा हा
    50 minutes ago ·
  • Pragya Maitri उसका वह क्षणिक जग बड़ा सुखद था निश्चय ही |
    सुन्दर निश्छल उस प्रेम में भी कही भरा था संशय ही ||
    44 minutes ago ·
  • Shriram Tiwary संशय होता तो आनंद कहाँ |
    निश्चय ही उस क्षणिक जग मे थी ,कहीं से बेवफाई की बू कहीं |
    34 minutes ago ·
  • Shriram Tiwary संशय होता तो आनंद कहाँ |
    निश्चय ही उस क्षणिक जग मे थी ,कहीं से बेवफाई की बू कहीं |
    34 minutes ago ·
  • Pragya Maitri संशयता के विष घट में भी आनंद क्षणिक तो होता है |
    दिल्लगी और बेवफाई से भी कभी प्यार तो होता है ||
    34 minutes ago · · 1 personLoading...
  • Shriram Tiwary यही सोच सोचकर,वह बेचारा |
    गमगीन हुए जाता है |
    , विष घाट मे तो मौत है फिर भी बेवफाई मे ghutan ,तड़प और बेमौत की मौत है |
    30 minutes ago ·
  • Pragya Maitri नश्वर यह सारा अग-जग नश्वर यह मेरा तन है |
    है अर्थ जन्म का मरना संसृति का लक्ष्य निधन है ||
    फिर क्यों मृत्यु की चिंता से तृष्णा की रहती है सृष्टि?
    विष का पान करो निर्भयता से और पाओ अपार तृप्ति ||
    26 minutes ago · · 1 personLoading...
  • Shriram Tiwary ये रचना कहाँ की है पता नहीं ,
    ये यहाँ क्यों आई पता नहीं'
    फिर भी हल सुझाता हूँ,
    तृप्ति क्या है ,अतृप्ति क्या है |
    हम ये सोचे क्यों ,हमें तो बस आगे जाना है आगे जाते ही रहना है |
    20 minutes ago ·

Thursday, March 17, 2011

I am a simple & COOL engineering student. who believes in science & modern technology with hindu philosophy.
my motto of life is  "  always be happy " ...........................................................................................................................................................................................................................

{ मै एक साधारण एवं मस्त अभियांत्रिकी का क्षात्र हूँ |  जो विज्ञानं और नयी तकनीक के साथ हिन्दू दर्शन में  विश्वास करता/रखता है |}


 

एक उदासी -होली के बहाने

दोस्तों मै एक ऐसे जगह रहता हूँ जो देश मे होते हुए भी एक अलग देश लगता है |यहाँ होली मनाई तो जाती ही नहीं है, यदि कोई मानना भी चाहे तो वो मना नहीं सकता ,क्यूंकि यंहा इस राज्य मे होली का विरोध होता है| राज्य का नाम है "तमिलनाडु"------------शायद इसके पीछे मुझे कारण समझ मे आता है ,हिरंद्य्कस्यप और उसकी बहन होलिका ,तमिलनाडु और केरला के बिच के ही थे ,,या फिर केरला,आंध्र ,तमिलनाडु ,और कर्नाटका जब संयुक्त राज्य थे तब हिरंद्यक्स्याप यहाँ का राजा हुआ करता होगा ,उसके बाद प्रह्लाद और बाद मे राजा बलि आया ,रजा बलि काफी ताकतवर हों गया था देवताओं से भी जाएदा जिसके लिए ही केरला के लोग मुख्यतः ओनम मनाते है ,इसमे सभी धर्म के लोग खासकर इसाई समुदाय ख़ास रूचि लेता है |यहाँ के इसाई साधारणतः हिन्दू ही है पर इसाइयत का अनुसरण कर लिए हैं ,जैसे वे की औरतें आज भी साड़ियाँ ,चूड़ियाँ पहनती है और कुछ लोग सिन्दूर तक भी करते हैं ,पुरुष आज भी जो क्रूस पहनते है वो तुलसी माला की तरह होता है,हिन्दुओं की तरह हाथ मे रक्षा { पवित्र धागा} बांधते हैं | बात करते-करते मै कहाँ से कहाँ पहुँच जाता हूँ ,शायद आपलोग हँस रहे होंगे की मै क्या बक बक कर रहा हूँ ,हा हा हा हा कोई बात नहीं, बात यह है की मेरा मन नहीं लग रहा है यहाँ ,होली है न, और मै चाह के भी अपने प्यारे त्योहार होली को मना नहीं सकता |................................ SRT

होली

दोस्तों,
क्या करूँ, कुछ समझ मे नहीं आ रहा .
कहाँ जाऊं ,मन नहीं लग रहा यहाँ .
होली मे घर जा नहीं सकता ,परीक्षा है कुछ दिनों के बाद |
होली मै यहाँ मै मना नहीं सकता , रंगों की नासमझी है यहाँ |
... कहीं घुमने जाने का मन नहीं करता ,कमरे मे जी नहीं लगता |
उहाफोह मे पड़ा हुआ हूँ , जीवन नैया खे रहा हूँ |.............SRT

ज्वलन्त विचार

ज्वलन्त विचार

by Shriram Tiwary on Thursday, 17 March 2011 at 10:05
नास्तिक होना अच्छा है या बुरा है ,इस मुद्दे पर मेरी जानकारी थोडा सा कम है |पर इतना तो पता ही है की आशा और विश्वास पर दुनिया कायम है और आस्तिक लोग आशावान होते हैं |क्यूँकि वे भूल से या जानबूझकर ही सही भगवान पर आशा या विश्वास करने लग जाते हैं.|और नास्तिक लोग नकरातम विचारों एवं निराशा के धनी हों जातें हैं | मुझे लगता है एक वैज्ञानिक भी पूर्ण रूप से नास्तिक नहीं होता , नही तो वो भी आशा एवं सकारात्मक विचारों के अभाव मे कोई शोध कार्य जीवन मे पूरा नहीं कर सकता है,,क्यूंकि नास्तिक्तापन की वजह से उसमे नकारात्मकता एवं निराशा आ जाएगी फिर वह अवसाद ग्रस्त हों जायेगा.२०वीं सतबादी के सबसे बड़े बुध्जीवी थे अल्बर्ट आइन्स्टीन वो भी भी ईश्वर की सत्ता मे विश्वास करते थे ,क्यूंकि बिना सकारात्मक विचार और आशा के विज्ञानं मे भी कुछ संभव नहीं है | SO BE A OPTIMIST MA FRZZZZZ...............................SRT
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  • You, Rashmi Patel and Sagar Gujrati like this.
    • Ml Gurjar मेरा सुझाव है की ..शहीदे आज़म सरदार भगत सिंह ..का लेख ..में नास्तिक क्यों हूँ पढना चहिये ..
      8 hours ago · · 1 personLoading...
    • Shriram Tiwary आपका सुझाव आदर योग्य है |पर आपको मै बता दूँ उनका उस समय किसी ख़ास मकसद,वजह से विरक्ति हों गयी थी धर्मं से पर आप गौर कीजिएगा उन्होंने कभी पगड़ी पहनना नहीं छोड़ा था क्यों ????????????? उस ख़ास एक निश्चित वक़्त मे उन्होंने देश हित के लिए नास्तिक्तापन की बात किये होंगे जो देश की क्रांति और देश हित के लिए जरूरी थी ,वो क्रांति मे सभी धर्मों की एकता चाहते थे तभी तो उन्होंने असफाक को अपने साथ रखते थे|
      8 hours ago · · 1 person

Wednesday, March 16, 2011

तत्क्षण जिंदगी

इस जिंदगी मे हम , कुछ कर न सके |
गैरों के लिए हम , मर न सकें |
                             तनहा हम , रह न सकें|
                             जुदाई मे भी हम, रो न सकें |
अपने लिए कुछ हम , कर न सके |
...
देश के लिए हम , मर न सकें |
                            दिन मे हम , कुछ कर न सकें |
                            रात मे भी हम ,चैन से सो न सकें |
......SRT

Monday, March 14, 2011

खून खौलता है जिनका , नींद कहाँ उन्हें आती है |



लाख कांटें राहों मे बिछे हों, रुकने आता नहीं |



भय -शत्रु लाख हों , पर झुकने आता नहीं ||
जज्बा ही मर गया जिनका ,
                                  अमृत {चाणक्य } क्या कर लेगा उनका |
५०० सालों की गुलामी,जकड़ी है इन  हाथों को ||

Friday, March 4, 2011

पहचान

दिन गुजरते जाते हैं,
हम यूँ ही रह जाते हैं |
दुनिया की परवाह नहीं पर,
दुनिया मे रह जाते हैं|........................SRT
 
 
 
लहरों से घबराएँ क्योँ हम .
गलती से पछताएँ क्योँ हम |
                                   लहरों में हम खेलें हैं,
                                   गलती से हम सीखे हैं ||