खून खौलता है जिनका , नींद कहाँ उन्हें आती है |
लाख कांटें राहों मे बिछे हों, रुकने आता नहीं |
भय -शत्रु लाख हों , पर झुकने आता नहीं ||जज्बा ही मर गया जिनका ,
अमृत {चाणक्य } क्या कर लेगा उनका |
५०० सालों की गुलामी,जकड़ी है इन हाथों को ||
लाख कांटें राहों मे बिछे हों, रुकने आता नहीं |
भय -शत्रु लाख हों , पर झुकने आता नहीं ||जज्बा ही मर गया जिनका ,
अमृत {चाणक्य } क्या कर लेगा उनका |
५०० सालों की गुलामी,जकड़ी है इन हाथों को ||
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