- Pragya Maitri 4 tiwaari ji!आकुल आतुर दुःख से कातर पटक पटक रो रोकर |
करता है कितना कोलाहल तिवारी जी का मन निर्मल ||about an hour ago · · 1 personLoading... - Shriram Tiwary निर्मल तो है मेरा मन जी,
क्यूँ रो रो कर करती है अपना मन निर्मम,
ज्वाला को छूने से जल जाता है बर्फ का तन |@ Pragya Maitriabout an hour ago · - Pragya Maitri नव उज्ज्वल जलधार हार हीरक सी में सोहती |
बिच बिच लहराती बूँद मनु मुक्तामणि पोहती ||57 minutes ago · · 1 personYou like this. - Shriram Tiwary एक निर्मल,पवित्र मन मुग्ध था मिर्ग्मारिच्का पर.
जब पास आया तो देखकर क्षुब्ध हुआ ,रोया ,पछताया समय गंवाया |
पर सोचा ,कम से कम थोडा आनंद तो मिला अल्प समय मे |हा हा अ हा हा50 minutes ago · - Pragya Maitri उसका वह क्षणिक जग बड़ा सुखद था निश्चय ही |
सुन्दर निश्छल उस प्रेम में भी कही भरा था संशय ही ||44 minutes ago · - Shriram Tiwary संशय होता तो आनंद कहाँ |
निश्चय ही उस क्षणिक जग मे थी ,कहीं से बेवफाई की बू कहीं |34 minutes ago · - Shriram Tiwary संशय होता तो आनंद कहाँ |
निश्चय ही उस क्षणिक जग मे थी ,कहीं से बेवफाई की बू कहीं |34 minutes ago · - Pragya Maitri संशयता के विष घट में भी आनंद क्षणिक तो होता है |
दिल्लगी और बेवफाई से भी कभी प्यार तो होता है ||34 minutes ago · · 1 personLoading... - Shriram Tiwary यही सोच सोचकर,वह बेचारा |
गमगीन हुए जाता है |
, विष घाट मे तो मौत है फिर भी बेवफाई मे ghutan ,तड़प और बेमौत की मौत है |30 minutes ago · - Pragya Maitri नश्वर यह सारा अग-जग नश्वर यह मेरा तन है |
है अर्थ जन्म का मरना संसृति का लक्ष्य निधन है ||
फिर क्यों मृत्यु की चिंता से तृष्णा की रहती है सृष्टि?
विष का पान करो निर्भयता से और पाओ अपार तृप्ति ||26 minutes ago · · 1 personLoading... - Shriram Tiwary ये रचना कहाँ की है पता नहीं ,
ये यहाँ क्यों आई पता नहीं'
फिर भी हल सुझाता हूँ,
तृप्ति क्या है ,अतृप्ति क्या है |
हम ये सोचे क्यों ,हमें तो बस आगे जाना है आगे जाते ही रहना है |20 minutes ago ·
Friday, March 18, 2011
एक वार्तालाप फुर्सत के क्षणों में
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